रतलाम जिले में नया शैक्षणिक सत्र 2026-27 शुरू होते ही निजी स्कूलों की होड़ तेज हो गई है। शहर से लेकर गांव तक बड़े-बड़े फ्लेक्स, आकर्षक विज्ञापन और अंग्रेजी माध्यम के नाम पर पालकों को लुभाने का खेल जारी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन दावों की कभी जांच हुई? या शिक्षा के नाम पर खुलेआम व्यापार चल रहा है?
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या इन अधिकारियों ने कभी इन होर्डिंग्स और विज्ञापनों की सच्चाई जांची? या फिर सब कुछ कागजी कार्रवाई तक सीमित है?
‘सेटिंग’ का खेल—किताब, कॉपी और ड्रेस में भारी कमीशन सूत्रों के अनुसार, नए सत्र से पहले ही कई स्कूलों ने किताब, कॉपी और ड्रेस को लेकर दुकानदारों से ‘सेटिंग’ कर ली है। 25% से 60% तक कमीशन का खेल बताया जा रहा है। पालकों को एक तय दुकान से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है—जो सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट और शिक्षा विभाग के सख्त नियम—क्या हो रहा पालन? देश में स्कूल संचालन को लेकर Supreme Court of India और शिक्षा विभाग ने स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं, जिनकी खुलेआम अनदेखी के आरोप लग रहे हैं:
एनसीईआरटी किताबों की बाध्यता: किसी विशेष दुकान से खरीदने के लिए मजबूरी नहीं
यूनिफॉर्म/स्टेशनरी में पारदर्शिता, कमीशन पूरी तरह अवैध स्कूल बस सुरक्षा: फिटनेस, बीमा, सीट क्षमता, महिला अटेंडर, स्पीड गवर्नर, CCTV, ड्राइवर पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य, मान्यता (Recognition) जरूरी, एक्सपायर होने पर संचालन अवैध
योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक अनिवार्य
इन्फ्रास्ट्रक्चर तय मानकों के अनुसार होना जरूरी
स्कूल बसों में सुरक्षा या सिर्फ खानापूर्ति?
बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन सवाल खड़े हैं—
क्या बसों का फिटनेस और बीमा वैध है?
क्या सीटों के हिसाब से ही बच्चों को बैठाया जा रहा है?
क्या महिला अटेंडर मौजूद है?
या फिर बच्चों की जान से खिलवाड़ हो रहा है?
बुनियादी सुविधाओं पर भी बड़ा सवाल
क्या स्कूलों में वास्तव में वह सुविधाएं हैं जिनका विज्ञापन किया जा रहा है?
क्या खेल मैदान मौजूद है या सिर्फ कागजों में?
क्या लाइब्रेरी और प्रयोगशाला (लेब) सही तरीके से संचालित हो रही हैं?
क्या कैंपस की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं?
क्या स्कूल परिसर और बसों में अग्निशमन यंत्र (Fire Extinguisher) उपलब्ध हैं?
क्या फर्स्ट एड बॉक्स हर समय उपलब्ध रहता है?
मान्यता और गुणवत्ता—कागजों में पूरी, जमीन पर गायब?
क्या इन स्कूलों की मान्यता समय पर रिन्यू हुई?
क्या अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में शिक्षक वास्तव में प्रशिक्षित हैं?
या सिर्फ ‘English Medium’ का बोर्ड लगाकर पालकों को भ्रमित किया जा रहा है?
गांव-गांव एडमिशन ड्राइव—लुभावने वादे, हकीकत गायब
निजी स्कूलों द्वारा गांव-गांव डोर-टू-डोर जाकर एडमिशन के लिए प्रचार किया जा रहा है। बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं, लेकिन उनकी सच्चाई जांचने वाला कोई नजर नहीं आता।
जिम्मेदारों की चुप्पी—लापरवाही या मिलीभगत?
जब इतनी अनियमितताओं की चर्चा खुलेआम हो रही है, तो DEO और BEO की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत भी?
अब नजर कलेक्टर के रुख पर
इस पूरे मामले में अब सबकी नजर जिले की कलेक्टर मिशा सिंह पर टिकी है, जो अपनी सक्रियता और सख्त कार्यशैली के लिए जानी जाती हैं।
सवाल यह है कि क्या वे इस संवेदनशील मुद्दे पर सख्त कार्रवाई करेंगी?
क्या स्कूलों में चल रही अनियमितताओं पर लगाम लगेगी?
पालकों के भरोसे के साथ खिलवाड़ बंद होना चाहिए
शिक्षा सेवा है, व्यवसाय नहीं। यदि समय रहते प्रशासन ने सख्ती नहीं दिखाई, तो यह ‘शिक्षा का बाजार’ बच्चों के भविष्य के साथ बड़ा खिलवाड़ साबित होगा। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और जिला प्रशासन मिलकर इस पर कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी सिर्फ विज्ञापनों और दावों तक ही सीमित रह जाएगा। जिले में शुभदर्शन TV न्यूज़ चैनल बहुत जल्द ऐसे शिक्षा माफियाओं का बहुत जल्द खुलासा करेगा। जिन्होंने शिक्षा को व्यापार बना रखा है। चाहे वह मान्यता के मापदंड हो या फोरलेन किनारे स्कूलों की अनदेखी हो, इन विद्यालयों में कितने बीएड डीएड किए शिक्षक शिक्षिका पढ़ा रहे है। औऱ क्या जो शासन को मान्यता लेते समय जानकारी दे रखी है वही पढ़ा रहे है या नही, क्या पढ़ाने वाले शिक्षकों का वैतन किस आधार पर कितना दिया जा रहा है। सारे मापदंडों के आधार पर एक एक करके जल्द खुलासा किया जाएगा।

*_जितेन्द्रदास_बैरागी_वैष्णव_* *_शुभदर्शन_TV_न्यूज़_चैनल_*
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