रतलाम जिले के ग्राम बिरमावल स्थित शासकीय मंदिर श्री गोपालजी की संपत्ति और व्यवस्थाओं को लेकर एक गंभीर विवाद सामने आया है। मंदिर के पुजारी सनत कुमार द्विवेदी एवं उनके परिजनों के विरुद्ध मंदिर की संपत्ति पर कथित कब्जा करने, शासकीय भूमि का निजी उपयोग करने, मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति गायब करने तथा मंदिर की आय को निजी उपयोग में लेने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए कलेक्टर से आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की मांग की गई है।
हैरानी की बात यह है कि शिकायतकर्ता के अनुसार इन आरोपों की जांच ग्रामीण तहसीलदार के यहां पिछले सात महीने से लंबित है। वहीं 13 मई 2026 को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत क्रमांक 38295385 भी शिकायत के अनुसार 175 दिनों से लंबित बताई जा रही है। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामला शासकीय मंदिर, सरकारी जमीन, धार्मिक संपत्ति और संभावित आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा है, तो जांच आगे क्यों नहीं बढ़ रही?
बैंक में नौकरी करते हुए मंदिर का पुजारी बनने का आरोप, नियुक्ति पर उठे सवाल
शिकायत में बताया गया है कि मंदिर के वर्तमान पुजारी सनत कुमार पिता रमाकांत द्विवेदी की नियुक्ति वर्ष 1992 में हुई थी। उस समय उनकी उम्र लगभग 47 वर्ष बताई गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि नियुक्ति के समय सनत द्विवेदी धार स्थित भूमि विकास बैंक की शाखा में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति तक वहीं पदस्थ रहे।
ऐसे में सवाल उठाया गया है कि एक व्यक्ति बैंक की नियमित नौकरी करते हुए रतलाम जिले के ग्राम बिरमावल स्थित शासकीय मंदिर का पुजारी कैसे नियुक्त हो गया? क्या नियुक्ति के समय बैंक की नौकरी की जानकारी संबंधित विभाग से छिपाई गई थी? क्या पुजारी नियुक्ति के लिए निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन किया गया था?
यदि नियुक्ति के समय महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हैं तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि शासन को धोखे में रखने का गंभीर मामला हो सकता है। इसकी नियुक्ति संबंधी मूल फाइल, आदेश और बैंक सेवा अभिलेखों की जांच आवश्यक है।
मंदिर के आसपास सरकारी जमीन पर दो मंजिला मकान बनाने का आरोप
शिकायत में दूसरा गंभीर आरोप मंदिर के आसपास की शासकीय भूमि पर अतिक्रमण का है। आरोप है कि पुजारी ने वर्ष 2020 में मंदिर की दीवार के समीप शासकीय जमीन पर दो मंजिला निजी पक्का भवन बना लिया।
इतना ही नहीं, मंदिर और मकान के सामने स्थित शासकीय भूमि को भी घेरकर पक्की बाउंड्रीवाल बनाए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते पर भी कब्जा किया गया है, जिससे शासकीय मंदिर की जमीन का स्वरूप ही बदल गया है।
शिकायत में यह भी आरोप है कि शासन की स्वामित्व योजना का लाभ लेकर मंदिर के आसपास की सरकारी जमीन को अपने नाम दर्ज करवाया गया, जबकि दस्तावेजों में वास्तविक कब्जे से कम क्षेत्रफल दर्शाया गया है।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी संपत्ति के रिकॉर्ड और स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की भी गंभीर जांच का विषय बनेगा।
मंदिर के बाड़े से 30 हजार रुपये प्रतिमाह किराया, राशि मंदिर के खाते में जमा हुई या नहीं?
मामले का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू मंदिर की आय से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार ग्राम बिरमावल में छतरी मुंदड़ी रोड पर मंदिर की एक शासकीय संपत्ति बाड़े के रूप में स्थित है।
आरोप है कि इस बाड़े को पहले गांव के सत्यनारायण पिता बगदीराम राठौड़ को भैंसों का तबेला संचालित करने के लिए लगभग 10 हजार रुपये प्रतिमाह किराये पर दिया गया था। करीब दो वर्ष बाद वहां टीनशेड लगाकर दुकान का स्वरूप तैयार किया गया और फिर इसे पड़ोसी राकेश पिता बद्रीलाल प्रजापत को लगभग 30 हजार रुपये प्रतिमाह किराये पर दे दिया गया।
इस हिसाब से यदि 30 हजार रुपये प्रतिमाह किराया वास्तव में प्राप्त किया जा रहा है तो सालाना किराये की राशि 3 लाख 60 हजार रुपये होती है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस किराये की राशि का हिसाब कहां है? क्या यह पैसा मंदिर के बैंक खाते में जमा हुआ? क्या मंदिर की आय-व्यय की नियमित ऑडिट हुई? क्या किराये पर देने के लिए सक्षम विभाग की अनुमति ली गई?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि मंदिर की इस संपत्ति से प्राप्त किराया मंदिर के खाते में जमा करने के बजाय पुजारी द्वारा निजी आवश्यकताओं में उपयोग किया जा रहा है।
इसके अलावा मंदिर की लगभग 38 बीघा कृषि भूमि भी ग्राम बिरमावल में होने की बात कही गई है। आरोप है कि इस जमीन को लीज पर देकर मिलने वाली राशि का भी निजी उपयोग किया जा रहा है।
यदि ऐसा है तो वर्षों की कृषि आय और किराये की राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। प्रशासन को यह भी जांचना चाहिए कि मंदिर की जमीन किसे, किस प्रक्रिया से और कितनी राशि पर लीज पर दी गई।
सबसे गंभीर आरोप: शासकीय मंदिर से द्वारकाधीश की प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति गायब!
इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील और गंभीर आरोप मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण के द्वारकाधीश स्वरूप की प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति को लेकर लगाया गया है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि लगभग 22-23 वर्ष पूर्व मंदिर से उक्त मूर्ति गायब कर दी गई और पुजारी सनत द्विवेदी के भाइयों एवं अन्य परिजनों की मिलीभगत से उसे धार स्थित उनके संयुक्त परिवार के निजी मकान नंबर 06, महावीर मार्ग, बनियावाड़ी की ऊपरी मंजिल पर स्थापित कर दिया गया।
शिकायत में सनत द्विवेदी के भाइयों देवर्षि, श्रीकांत, कपिल तथा परिवार के अन्य सदस्यों के नामों का भी उल्लेख किया गया है।
यह आरोप अत्यंत गंभीर है। यदि मंदिर से वास्तव में प्राण-प्रतिष्ठित शासकीय मूर्ति हटाई गई है तो यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मंदिर की संपत्ति और संभावित आपराधिक कृत्य की जांच का मामला है।
प्रशासन को तत्काल यह पता लगाना चाहिए कि मंदिर में वर्तमान में कौन-सी मूर्ति स्थापित है, पुरानी मूर्ति कहां है, उसे हटाने की कोई वैधानिक अनुमति ली गई थी या नहीं और धार स्थित मकान में रखी मूर्ति का वास्तविक स्रोत क्या है।
भगवान की मूर्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति कैसे हो सकती है? यदि मूर्ति शासकीय मंदिर की है तो उसके स्थानांतरण का अधिकार किसने दिया?
जांच प्रभावित करने और गवाहों को धमकाने के भी आरोप
शिकायत में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है कि जांच को प्रभावित करने के उद्देश्य से पुजारी और उनके परिवार के कुछ सदस्य आसपास के लोगों पर अपने पक्ष में गवाही देने का दबाव बना रहे हैं।
शिकायतकर्ता ने सनत द्विवेदी, उनकी महिला मित्र पुष्पा उर्फ बेबी सोनी, भतीजे निरंजन और पुत्री रचना सहित कुछ लोगों पर स्थानीय नागरिकों को प्रभावित करने तथा धमकाने के आरोप लगाए हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होना आवश्यक है। यदि किसी गवाह को डराया या धमकाया जा रहा है तो प्रशासन को उनकी सुरक्षा और निष्पक्ष बयान सुनिश्चित करने चाहिए।
हालांकि इन सभी आरोपों की अभी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि होना शेष है और संबंधित पक्षों का जवाब भी सामने आना बाकी है।
सात महीने की जांच, 175 दिन की CM हेल्पलाइन: आखिर जवाबदेह कौन?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल आरोपों से भी आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का है।
एक ओर शिकायतकर्ता मंदिर की सरकारी संपत्ति, 38 बीघा कृषि भूमि, किराये की आय और मूर्ति के संबंध में गंभीर आरोप लगा रहा है। दूसरी ओर शिकायत के अनुसार तहसील स्तर पर जांच सात महीने से लंबित है और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत क्रमांक 38295385 का भी अब तक निराकरण नहीं हुआ है।
क्या प्रशासन ने मौके पर जाकर सरकारी जमीन का सीमांकन कराया?
क्या मंदिर की संपत्ति का राजस्व रिकॉर्ड जांचा गया?
क्या मंदिर के बाड़े से मिलने वाले किराये की जांच हुई?
क्या 38 बीघा कृषि भूमि की लीज और उससे प्राप्त आय का हिसाब मांगा गया?
क्या पुजारी की नियुक्ति के समय के दस्तावेजों की जांच हुई?
क्या कथित रूप से गायब मूर्ति के संबंध में पुलिस को कोई जांच सौंपी गई?
यदि इन बुनियादी सवालों पर भी जांच नहीं हुई है तो सात महीने तक फाइल लंबित रहने का औचित्य क्या है?
कलेक्टर से FIR, संपत्ति की जांच और जवाबदेही तय करने की मांग
शिकायतकर्ता ने जिला कलेक्टर से पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। मांगों में प्रमुख रूप से:
* पुजारी की वर्ष 1992 की नियुक्ति और उस समय की बैंक सेवा की जांच।
* मंदिर के आसपास की शासकीय भूमि का राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर सीमांकन।
* कथित अतिक्रमण और निर्माण की वैधानिकता की जांच।
* मंदिर के बाड़े से प्राप्त किराये की पूरी जानकारी और बैंक खाते का ऑडिट।
* मंदिर की 38 बीघा कृषि भूमि की लीज और वर्षों की आय-व्यय का हिसाब।
* द्वारकाधीश स्वरूप की कथित रूप से गायब मूर्ति की स्वतंत्र जांच।
* जांच प्रभावित करने और गवाहों को धमकाने के आरोपों की जांच।
* जांच में अपराध प्रमाणित होने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध FIR दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल
शासकीय मंदिर किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं होता। मंदिर की जमीन, भवन, बाड़ा, कृषि भूमि और उससे प्राप्त आय सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति का हिस्सा होते हैं। इनका संरक्षण करना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों में सच्चाई है तो मामला बेहद गंभीर है। और यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर शिकायतकर्ता के सामने तथ्य रखना चाहिए।
लेकिन सात महीने तक जांच लंबित रखना किसी भी स्थिति में उचित प्रशासनिक जवाबदेही का उदाहरण नहीं हो सकता।
रतलाम कलेक्टर को अब इस मामले में केवल जांच आगे बढ़ाने का आदेश देने के बजाय समय-सीमा तय कर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर राजस्व, देवस्थान और पुलिस विभाग की संयुक्त टीम बनाकर मंदिर की संपत्ति का भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए।
आखिर बिरमावल के शासकीय गोपालजी मंदिर की संपत्ति पर किसका अधिकार है? मंदिर की आय का हिसाब कौन देगा? द्वारकाधीश की मूर्ति कहां है? और सात महीने से जांच की फाइल दबाकर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब कौन मांगेगा?
इन सवालों के जवाब अब जनता जानना चाहती है।
नोट: यह समाचार प्राप्त शिकायत एवं उसमें लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों का पक्ष प्राप्त किया जाना शेष है। किसी भी व्यक्ति का दोष जांच और सक्षम न्यायालय के निर्णय से ही स्थापित होगा।
प्रकाशन संबंधी सुझाव: इस खबर के साथ शिकायत की प्रति, CM हेल्पलाइन की वर्तमान स्थिति, नियुक्ति आदेश, जमीन का खसरा-नक्शा और मंदिर की आय के दस्तावेज उपलब्ध हों तो खबर और अधिक प्रमाणिक तथा प्रभावशाली बनेगी। संबंधित पुजारी और प्रशासन का पक्ष भी प्रकाशित करें।