जेडी बैरागी वैष्णव, रतलाम & गौरव पांडेय, सतना – शुभदर्शन TV न्यूज़ चैनल— रतलाम आईएएस 2012 बैच के अधिकारी अजय कटेसरिया ने मंगलवार को रतलाम जिले के नए कलेक्टर के रूप में पदभार संभाल लिया। पूर्व कलेक्टर मिशा सिंह ने उन्हें कार्यभार सौंपा। पदभार ग्रहण करते ही कटेसरिया ने पारदर्शी प्रशासन, ई-फाइल व्यवस्था और शासन की प्राथमिकताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही।
लेकिन रतलाम में उनकी नई पारी शुरू होते ही सतना का वह पुराना और बहुचर्चित सरकारी जमीन प्रकरण फिर चर्चा में आ गया, जिसने कभी प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी थी।
मामला इसलिए भी गंभीर सवाल खड़े करता है क्योंकि जिस प्रकरण में एक समय विभागीय जांच हुई, आरोप पत्र जारी हुआ और अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठे, उसी मामले में बाद में विभागीय निष्कर्ष बदल गया और 7 नवंबर 2025 को अजय कटेसरिया को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
सवाल सीधा है आखिर जांच की दिशा क्यों बदली? क्या पहली जांच में गलती थी या बाद की जांच में?
फरवरी 2020 से दिसंबर 2021 तक के आदेशों पर उठे थे सवाल
पूरा मामला उस समय का है जब अजय कटेसरिया सतना के कलेक्टर थे। आरोप विभागीय स्तर पर लगाए गए कि उनके कार्यकाल के दौरान कुछ मामलों में सरकारी और नजूल भूमि के स्वामित्व से जुड़े ऐसे आदेश पारित हुए, जिनसे निजी व्यक्तियों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होने का रास्ता बना।
आरोपों में यह भी शामिल था कि कुछ राजस्व अभिलेखों में ‘शासकीय’ शब्द हटाकर निजी स्वामित्व दर्ज किया गया। मामला सामने आने के बाद तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार ने दिसंबर 2021 में कटेसरिया का तबादला किया और पूरे मामले की विभागीय जांच के आदेश दिए।
यहीं से शुरू हुई उस फाइल की कहानी, जो वर्षों बाद फिर रतलाम में चर्चा का विषय बन गई है।
चार मामलों ने बढ़ाई थी प्रशासनिक हलचल
विभागीय आरोप पत्र में मुख्य रूप से चार प्रकरणों का उल्लेख किया गया था—
पहला— चित्रकूट तहसील के मझगवां क्षेत्र की करीब 36 एकड़ सरकारी भूमि को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज करने का मामला।
दूसरा— कोलगवां क्षेत्र की नजूल भूमि को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज किए जाने का प्रकरण।
तीसरा— आरजी क्रमांक 136/1 एवं 137 की सरकारी नजूल भूमि से संबंधित आदेश।
चौथा— रघुराजनगर तहसील के सोनौरा-छतैली क्षेत्र में सरकारी भूमि के स्वामित्व परिवर्तन का मामला।
इन चार प्रकरणों को आधार बनाकर विभागीय जांच आगे बढ़ी।
पहली जांच में उठी उंगली, फिर आया आरोप पत्र
पूरे मामले की जांच तत्कालीन रीवा संभागायुक्त अनिल सुचारी को सौंपी गई थी। जांच के बाद भेजी गई रिपोर्ट में अजय कटेसरिया की भूमिका पर सवाल उठाए गए और उन्हें जिम्मेदार माना गया।
इसी रिपोर्ट के आधार पर सामान्य प्रशासन विभाग यानी GAD ने 30 मार्च 2022 को विभागीय आरोप पत्र जारी किया।
इसके बाद मामला यहीं नहीं रुका। जुलाई 2024 में अतिरिक्त आरोप भी जोड़े गए।
यानी जिस मामले की शुरुआत सरकारी जमीन से जुड़े राजस्व आदेशों से हुई थी, वह धीरे-धीरे एक बड़े प्रशासनिक विवाद में बदल गया।
शिवराज के बयान ने मामले को बना दिया था राजनीतिक मुद्दा
अप्रैल 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चित्रकूट के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बिना नाम लिए सतना के पूर्व कलेक्टर से जुड़े सरकारी जमीन प्रकरण का जिक्र किया था। उन्होंने सरकारी जमीन को निजी किए जाने की शिकायत का उल्लेख करते हुए जांच और दोषियों पर कार्रवाई की बात कही थी। उस वक्त यह संदेश साफ था कि सरकार इस मामले को गंभीरता से देख रही है। लेकिन कुछ वर्षों बाद इसी प्रकरण की कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए।
कटेसरिया ने कहा—मैंने मनमानी नहीं की
आरोप पत्र का जवाब देते हुए अजय कटेसरिया ने आरोपों से इनकार किया। उनका पक्ष था कि संबंधित आदेश उन्होंने अपनी मनमानी या व्यक्तिगत विवेकाधीन शक्ति से नहीं बल्कि राजस्व मंडल, अपर आयुक्त और अन्य सक्षम न्यायिक प्राधिकारियों के आदेशों के अनुपालन में पारित किए थे। उन्होंने यह भी कहा कि जहां राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन हुआ, वहां वैधानिक अधिकार संबंधित राजस्व अधिकारियों के पास था। कुछ मामलों में विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी जानकारी का हवाला देते हुए भी उन्होंने अपने निर्णयों को सही ठहराया और प्रारंभिक जांच में की गई टिप्पणियों को तथ्यों की गलत व्याख्या बताया।
और यहीं से पलट गई जांच की कहानी!
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल है। कटेसरिया के जवाब के बाद GAD ने मामले में पुनः रीवा संभागायुक्त कार्यालय से अभिमत मांगा। इसके बाद आई दूसरी राय में उनके स्पष्टीकरण को स्वीकार्य माना गया। और फिर आया वह आदेश, जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी।
7 नवंबर 2025—कटेसरिया को क्लीन चिट
सामान्य प्रशासन विभाग ने अंतिम आदेश जारी करते हुए निष्कर्ष निकाला कि विभागीय जांच में लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए। इसके साथ ही अजय कटेसरिया को मामले के सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
एक ही मामले में दो अलग निष्कर्ष… सवाल तो उठेंगे!
अब सवाल यह नहीं है कि कटेसरिया को क्लीन चिट मिली या नहीं आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी है।
सवाल यह है कि—
पहली जांच में क्या तथ्य थे? उसी मामले की दूसरी राय में कौन-से नए तथ्य सामने आए? पहली जांच में जिम्मेदारी तय करने वाला आधार क्या था? बाद की जांच में वही आधार कमजोर कैसे पड़ गया? क्या पहली जांच में तथ्यों की व्याख्या गलत थी या बाद की समीक्षा में दृष्टिकोण बदला?
और सबसे बड़ा सवाल
अगर आरोप सिद्ध नहीं हुए तो शुरुआती जांच में अधिकारी की भूमिका पर इतने गंभीर सवाल क्यों उठे?
इन सवालों के जवाब सरकारी रिकॉर्ड और संबंधित जांच दस्तावेजों में ही तलाशे जा सकते हैं।
अब रतलाम में नई कुर्सी, पुराने सवालों की परछाई
अजय कटेसरिया अब रतलाम के कलेक्टर हैं। उन्होंने ई-फाइल व्यवस्था को प्राथमिकता देने, प्रशासन को पारदर्शी बनाने और शासन की योजनाओं को जमीन पर तेजी से लागू करने की बात कही है। लेकिन रतलाम की जनता और प्रशासनिक गलियारों में उनके पदभार के साथ सतना की पुरानी फाइल का खुलना महज संयोग नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल बन गया है। क्योंकि सरकारी जमीन जैसे संवेदनशील मुद्दे में जनता का सबसे बड़ा भरोसा राजस्व रिकॉर्ड और प्रशासनिक पारदर्शिता पर होता है। कटेसरिया को विभागीय स्तर पर क्लीन चिट मिल चुकी है यह तथ्य है। लेकिन पहली जांच से लेकर आरोप पत्र, फिर बदली हुई राय और अंततः क्लीन चिट तक की पूरी प्रक्रिया अपने पीछे ऐसे सवाल जरूर छोड़ जाती है, जिन पर चर्चा होना स्वाभाविक है। अब देखना यह होगा कि रतलाम में नए कलेक्टर की कार्यशैली इन सवालों से आगे निकलकर पारदर्शिता और जवाबदेही की नई मिसाल कायम करती है या सतना की पुरानी फाइल की परछाई लंबे समय तक उनका पीछा करती रहेगी। फिलहाल कुर्सी नई है, जिला नया है लेकिन सवाल पुराने हैं।
