November 5, 2026 11:49 am

जावरा में पुजारियों के मानदेय में बड़ा घोटाला, तहसीलदार और नायब नाजिर पर भेदभाव और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप – अखिल भारतीय पुजारी महासंघ करेगा कमिश्नर से शिकायत

जेडी बैरागी वैष्णव, शुभदर्शन TV न्यूज़ चैनल- रतलाम के जावरा नगर के प्राचीन शासकीय मंदिरों में पूजा-अर्चना करने वाले पुजारियों के मानदेय को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर पुजारियों ने तहसील कार्यालय जावरा की भुगतान प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि वर्ष 2019 से 2023 के बीच मानदेय के भुगतान में शासन द्वारा निर्धारित व्यवस्था का समान रूप से पालन नहीं किया गया और कुछ मामलों में पात्रता तथा नियुक्ति के बावजूद पुजारियों को मानदेय नही दिया गया।

मामले को लेकर जावरा के पुजारियों ने अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश पुजारी को उज्जैन स्थित केंद्रीय कार्यालय में पूरे मामले से अवगत कराया। महासंघ ने दस्तावेजों के आधार पर मामले को गंभीर मानते हुए उच्च अधिकारियों के समक्ष शिकायत रखने का निर्णय लिया है।

RTI से सामने आए दस्तावेजों ने बढ़ाई हलचल

पुजारियों का आरोप है कि तहसील कार्यालय जावरा द्वारा किए गए भुगतान में अलग-अलग राशि दिखाई दे रही है। शिकायत के अनुसार किसी पुजारी को 50 हजार रुपये, किसी को 60 हजार रुपये तो किसी को करीब 23 हजार रुपये तक का भुगतान किया गया। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के मंदिरों के लिए निर्धारित मानदेय को लेकर भी भुगतान में अंतर होने का आरोप लगाया गया है।

हालांकि, इन राशियों का अंतिम रूप से सही या गलत होना मूल RTI दस्तावेजों, संबंधित शासन आदेशों और भुगतान अभिलेखों की जांच के बाद ही तय हो सकेगा। इसलिए मामले में उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई गई है।

2019 के आदेश से लेकर 2022 के बदलाव तक—नियम क्या कहते हैं?

मध्यप्रदेश में शासन-संधारित मंदिरों के पुजारियों के मानदेय को लेकर समय-समय पर शासन ने दरों में बदलाव किए हैं। 2019 में शासन-संधारित मंदिरों के कुछ पुजारियों का मानदेय बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रतिमाह किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद 1 मई 2022 से प्रभावी व्यवस्था में बिना कृषि भूमि वाले शासन-संधारित मंदिरों के पुजारियों के लिए 5,000 रुपये, पांच एकड़ तक कृषि भूमि वाले मंदिरों के लिए 2,500 रुपये और पांच से दस एकड़ तक भूमि वाले मंदिरों के लिए 2,000 रुपये प्रतिमाह की दर बताई गई थी। दस एकड़ से अधिक भूमि वाले मंदिरों के पुजारियों के लिए अलग से शासन मानदेय नहीं होने की बात भी आदेश के संबंध में प्रकाशित हुई।

यही वजह है कि जावरा के पुजारियों का कहना है कि हर भुगतान की अवधि और उस समय लागू शासन आदेश के अनुसार पात्रता की जांच होना जरूरी है।

बड़ा सवाल—बिना नियुक्ति आदेश के भुगतान कैसे?

मामले का सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिन व्यक्तियों के पास शासन की ओर से वैध पुजारी नियुक्ति का आदेश नहीं होने का दावा किया जा रहा है, उन्हें भी मानदेय का भुगतान किया गया, जबकि वैध नियुक्ति वाले कुछ पुजारी कथित तौर पर मानदेय से वंचित रह गए।

यह आरोप यदि दस्तावेजी जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल भुगतान की राशि में अंतर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पात्रता, नियुक्ति, भुगतान स्वीकृति और रिकॉर्ड सत्यापन की पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ सकती है।

मध्यप्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी जावरा विधानसभा क्षेत्र में शासन-संधारित मंदिरों और उनके पुजारियों के मानदेय से संबंधित जानकारी दर्ज है। वर्ष 2022 के एक जवाब में जावरा विधानसभा क्षेत्र में 219 शासकीय मंदिर और 65 पुजारियों को प्रतिमाह मानदेय दिए जाने की जानकारी दी गई थी।

वहीं एक अन्य विधानसभा प्रश्न में जावरा नगर, जावरा तहसील और पिपलोदा क्षेत्र के शासनाधीन मंदिरों में नियुक्त पुजारियों और उन्हें दिए जाने वाले मानदेय की जानकारी शासन से मांगी गई थी।

‘रिकवरी करवा देंगे’—पुजारियों ने लगाया धमकी का आरोप

पुजारियों का आरोप है कि जब उन्होंने कथित तौर पर मानदेय में अंतर और भुगतान संबंधी शिकायत को लेकर तहसीलदार के समक्ष अपनी बात रखी तो उन्हें यह कहकर दबाव में लेने का प्रयास किया गया कि “तुमसे रिकवरी कर पूरी राशि वसूली जाएगी।”

यह आरोप भी जांच का विषय है। यदि किसी पुजारी को शासन के नियमों के तहत वैध भुगतान मिला था तो उसकी रिकवरी किस आधार पर होगी और यदि भुगतान गलत तरीके से हुआ था तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी—इन दोनों सवालों का जवाब जांच में सामने आना जरूरी है।

महासंघ अब संभागायुक्त और धर्मस्व विभाग के दरवाजे पर

मामले को लेकर उज्जैन स्थित महासंघ के केंद्रीय कार्यालय में बैठक हुई। महासंघ के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव पं. महेश शर्मा और जावरा के पुष्कर गामोठ की उपस्थिति में निर्णय लिया गया कि पूरे दस्तावेजों के साथ संभागायुक्त उज्जैन तथा धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग, उज्जैन को लिखित शिकायत दी जाएगी।

मध्यप्रदेश का धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग पुजारियों/सेवादारों के मानदेय की व्यवस्था और उससे संबंधित नीतियों के लिए जिम्मेदार विभाग है तथा विभागीय प्रशासनिक कार्य कमिश्नर और कलेक्टर के माध्यम से भी कराया जाता है।

महासंघ की तीन प्रमुख मांगें

महासंघ ने मामले में—

  1. 2019 से 2023 तक किए गए संपूर्ण भुगतान की उच्चस्तरीय जांच,
  2. जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई,
  3. पात्रता और नियुक्ति के बावजूद जिन पुजारियों का मानदेय रोका गया है, उनका नियमों के अनुसार बकाया मानदेय तत्काल जारी करने

की मांग उठाई है।

अब जांच से ही साफ होगा—गलती कहां हुई?

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि RTI से प्राप्त भुगतान अभिलेखों और उस अवधि में लागू शासन आदेशों का आपस में मिलान करने पर क्या तस्वीर सामने आती है? किस मंदिर के पास कितनी भूमि थी, संबंधित अवधि में मानदेय की लागू दर क्या थी, किस व्यक्ति की वैध नियुक्ति थी, किसके नाम भुगतान स्वीकृत हुआ, भुगतान किस अधिकारी ने सत्यापित किया और किस आधार पर राशि जारी हुई—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।

फिलहाल पुजारियों के आरोपों ने जावरा तहसील कार्यालय की भुगतान व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें संभागायुक्त उज्जैन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग की प्रस्तावित शिकायत और उसके बाद होने वाली जांच पर टिकी हैं। दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामला महज रिकॉर्ड/भुगतान की प्रशासनिक गड़बड़ी है या इसके पीछे वास्तविक वित्तीय अनियमितता हुई है।

 

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