November 6, 2026 2:22 pm

रतलाम में 10 लाख लीटर गंदे पानी को साफ करने का दावा, लेकिन सवाल बड़ा—क्या उद्योगों के प्रदूषण पर लगेगी लगाम या सिर्फ कागजों पर दौड़ेगी ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन की योजना?

 

जेडी बैरागी वैष्णव- रतलाम में औद्योगिक विकास की दौड़ में पर्यावरण और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच रतलाम में एक ऐसी परियोजना तैयार की जा रही है, जिस पर आने वाले समय में पूरे औद्योगिक क्षेत्र की पर्यावरणीय जवाबदेही टिकी होगी। मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम (MPIDC) द्वारा औद्योगिक क्षेत्र में 1 एमएलडी क्षमता का कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) स्थापित किया जा रहा है। दावा है कि उद्योगों से निकलने वाले प्रतिदिन 10 लाख लीटर उपयोग किए गए पानी को आधुनिक तकनीकों से उपचारित कर दोबारा उद्योगों तक पहुंचाया जाएगा।

परियोजना में RO, MBR और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल प्रस्तावित है। कागजों पर यह व्यवस्था औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने और पानी की बचत करने की बड़ी पहल दिखाई देती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्लांट वास्तव में उद्योगों के प्रदूषित पानी को निर्धारित मानकों के अनुरूप साफ कर पाएगा? क्या प्रत्येक औद्योगिक इकाई को इस व्यवस्था से जोड़ा जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या प्लांट के संचालन के बाद भी इसकी नियमित निगरानी होगी?

### 10 लाख लीटर प्रतिदिन का उपचार, उद्योगों के सामने बड़ी जिम्मेदारी

प्रस्तावित प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 10 लाख लीटर औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार की होगी। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले पानी को पाइपलाइन अथवा टैंकरों के माध्यम से प्लांट तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद पानी में मौजूद तेल, ग्रीस, रासायनिक प्रदूषक, जैविक पदार्थ और घुले हुए लवण को अलग-अलग प्रक्रियाओं से हटाया जाएगा।

यहां सबसे अहम सवाल प्लांट की क्षमता और औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले वास्तविक अपशिष्ट जल की मात्रा का है। यदि उद्योगों से निकलने वाला पानी प्लांट की क्षमता से अधिक हुआ तो शेष पानी का क्या होगा? क्या सभी इकाइयों का अपशिष्ट जल अनिवार्य रूप से CETP तक पहुंचेगा या कुछ इकाइयां अपनी जिम्मेदारी से बचकर प्रदूषित पानी का अनुचित निस्तारण कर सकेंगी?

### चार चरणों में होगा उपचार, तकनीक की होगी असली परीक्षा

प्लांट में चार चरणों में पानी का उपचार प्रस्तावित है।

पहला चरण—प्राथमिक उपचार: इक्वलाइजेशन टैंक में पानी की गुणवत्ता संतुलित करने के बाद DAF और क्लैरिफ्लोक्यूलेटर तकनीक से तेल, ग्रीस और ठोस अशुद्धियां अलग की जाएंगी।

दूसरा चरण—जैविक उपचार: एनॉक्सिक ट्रीटमेंट, हाइड्रोजेल बायो-कल्चर और मेम्ब्रेन बायो रिएक्टर (MBR) के माध्यम से जैविक प्रदूषकों को कम किया जाएगा। इससे BOD, COD और नाइट्रोजन जैसे प्रदूषकों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

तीसरा चरण—RO तकनीक: रिवर्स ऑस्मोसिस के जरिए पानी में घुले लवण और TDS की मात्रा कम की जाएगी। इससे प्राप्त पानी को औद्योगिक उपयोग के योग्य बनाने का लक्ष्य है।

चौथा चरण—जीरो लिक्विड डिस्चार्ज: RO से निकलने वाले अधिक TDS वाले रिजेक्ट पानी को मल्टीपल इफेक्ट इवैपोरेटर (MEE) में भेजा जाएगा। यहां वाष्पीकरण के जरिए पानी और नमक को अलग किया जाएगा। प्राप्त कंडेनसेट का भी पुनः उपयोग किया जाएगा।

### गंदा पानी तो साफ होगा, लेकिन निकलेगा कितना नमक और स्लज?

इस पूरी परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू वह अपशिष्ट है, जो पानी को साफ करने के दौरान बाहर निकलेगा। RO और MEE प्रक्रिया के बाद नमक तथा स्लज भी उत्पन्न होंगे। इनके वैज्ञानिक निस्तारण के लिए अधिकृत TSDF सुविधा में भेजने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

लेकिन सवाल यह है कि प्रतिदिन कितना स्लज और कितना औद्योगिक नमक निकलेगा? उसकी गुणवत्ता की जांच कौन करेगा? परिवहन से लेकर अंतिम निस्तारण तक रिकॉर्ड कौन रखेगा? क्या इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी?

क्योंकि पानी का उपचार करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उपचार के बाद निकलने वाले खतरनाक अवशेषों का सुरक्षित निस्तारण भी है। यदि इन अवशेषों का सही प्रबंधन नहीं हुआ तो प्रदूषण का स्वरूप बदल सकता है, समस्या समाप्त नहीं होगी।

### उद्योगों को दोबारा मिलेगा पानी, ताजे जल स्रोतों पर घटेगा दबाव

परियोजना के तहत RO से प्राप्त पानी और MEE से मिलने वाले कंडेनसेट को स्टोरेज टैंक में एकत्रित कर पाइपलाइन से औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाने की योजना है। इसका उपयोग कूलिंग टावर और उत्पादन की उपयुक्त प्रक्रियाओं में किया जा सकेगा।

इससे उद्योगों की ताजे पानी पर निर्भरता घट सकती है। साथ ही औद्योगिक अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण से जल संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।

हालांकि, उपचारित पानी की गुणवत्ता लगातार निर्धारित मानकों के अनुरूप बनी रहे, इसके लिए नियमित लैब परीक्षण और ऑनलाइन निगरानी बेहद जरूरी होगी।

### ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन के दावे पर उठेंगे कई सवाल

रतलाम में CETP की स्थापना निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हो सकती है, लेकिन किसी भी परियोजना की सफलता केवल आधुनिक मशीनें लगाने से तय नहीं होती। उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि प्लांट कितनी क्षमता से संचालित होता है, कितना पानी वास्तव में उपचारित होता है और कितना पानी दोबारा उपयोग में आता है।

यदि प्लांट नियमित रूप से संचालित हुआ, सभी संबंधित उद्योग इससे जुड़े और प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का सख्ती से पालन हुआ तो यह व्यवस्था रतलाम के औद्योगिक क्षेत्र के लिए मिसाल बन सकती है। लेकिन यदि निगरानी कमजोर रही, तो करोड़ों की तकनीक और ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन के दावे भी सवालों के घेरे में आ सकते हैं।

### MPIDC और प्रदूषण नियंत्रण विभाग से इन सवालों के जवाब जरूरी

* CETP प्लांट की कुल निर्माण लागत कितनी है और इसे पूरा करने की निर्धारित समय-सीमा क्या है?

* क्या औद्योगिक क्षेत्र की सभी इकाइयों को CETP से जोड़ना अनिवार्य होगा?

* प्लांट की प्रतिदिन 10 लाख लीटर क्षमता वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल की मात्रा के मुकाबले पर्याप्त है?

* उपचारित पानी की गुणवत्ता की जांच कितनी बार और किस प्रयोगशाला में होगी?

* क्या प्लांट में ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जाएगा और इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होगी?

* RO रिजेक्ट, नमक और स्लज की प्रतिदिन कितनी मात्रा निकलेगी तथा उसका निस्तारण कहां होगा?

* प्लांट बंद रहने या क्षमता से अधिक पानी आने की स्थिति में औद्योगिक अपशिष्ट जल का क्या होगा?

* क्या प्रदूषण नियंत्रण विभाग नियमित निरीक्षण करेगा और लापरवाही पर संबंधित उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई होगी?

निष्कर्ष: रतलाम को केवल औद्योगिक निवेश और उत्पादन में आगे बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट का जिम्मेदारी से उपचार, जल का पुनर्चक्रण और पर्यावरणीय मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है। CETP प्लांट ग्रीन इंडस्ट्रियलाइजेशन की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि यह परियोजना जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है।

Leave a Comment

और पढ़ें

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें

सेवा संकल्प अभियान के तहत ग्राम पीर हिंगोरिया में निःशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित सरदार पटेल हॉस्पिटल की टीम ने ग्रामीणों को दिया निःशुल्क परामर्श, दवाइयाँ वितरित कीं; गंभीर मरीजों के उपचार में आयुष्मान योजना की जानकारी दी