रतलाम के जावरा में ऋण की बकाया किस्तें जमा कराने के नाम पर बजाज फाइनेंस के कर्मचारी द्वारा ₹16,350 नकद लेने और कथित तौर पर कंपनी में राशि जमा नहीं कराने का मामला सामने आया है। पत्रकार कॉलोनी, जावरा निवासी पत्रकार कीर्ति वर्रा ने बजाज फाइनेंस जावरा के कर्मचारी लखन गुर्जर के खिलाफ थाना जावरा शहर में शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की है। मामला केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि शिकायतकर्ता ने बजाज फाइनेंस शाखा की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
सर्वर डाउन बताकर ली नकद राशि, रसीद का किया वादा
शिकायत के मुताबिक कीर्ति वर्रा ने बजाज फाइनेंस जावरा शाखा से ₹2 लाख 38 हजार का ऋण लिया था। आर्थिक परेशानी के चलते कुछ किस्तें बकाया हो गई थीं। इसी दौरान 30 जून 2026 को बजाज फाइनेंस में कार्यरत बताए गए कर्मचारी लखन गुर्जर को जावरा नगरपालिका के बाहर दो किस्तों की कुल ₹16,350 राशि नकद दी गई।
शिकायतकर्ता के अनुसार जब राशि देने के बाद रसीद मांगी गई तो कर्मचारी ने सर्वर डाउन होने का हवाला देते हुए शाम को व्हाट्सऐप पर रसीद भेजने की बात कही। लेकिन कथित तौर पर न रसीद भेजी गई और न ही भुगतान का कोई प्रमाण उपलब्ध कराया गया।
कंपनी कार्यालय पहुंचने पर सामने आया चौंकाने वाला तथ्य
जब शिकायतकर्ता ने बजाज फाइनेंस कार्यालय में जाकर किस्तों की स्थिति की जानकारी ली तो कथित तौर पर पता चला कि ₹16,350 की राशि कंपनी के खाते में जमा ही नहीं हुई थी। इसके चलते किस्तें बकाया बताई गईं और उन पर पेनल्टी एवं ब्याज लगने की बात सामने आई।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कंपनी के कर्मचारी के रूप में काम करने वाला व्यक्ति ग्राहकों से ऋण की किस्त के नाम पर नकद राशि ले रहा था, तो उस राशि की रसीद और कंपनी के खाते में जमा होने की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
कर्मचारी काम छोड़कर चला गया तो जिम्मेदारी भी खत्म?
शिकायतकर्ता के मुताबिक कार्यालय में पूछताछ करने पर उन्हें बताया गया कि लखन गुर्जर काम छोड़कर चला गया है। इसके बाद कर्मचारी से संपर्क करने के प्रयास किए गए, लेकिन कथित तौर पर फोन रिसीव नहीं किया गया।
यहीं से बजाज फाइनेंस की कार्यप्रणाली पर सवाल और गंभीर हो जाते हैं। यदि कर्मचारी कंपनी के नाम पर ग्राहकों से राशि वसूलता था, तो कंपनी के पास उसकी अधिकृत भूमिका, वसूली का रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और ग्राहक से ली गई राशि का हिसाब होना चाहिए। ऐसे में केवल यह कह देना कि कर्मचारी नौकरी छोड़कर चला गया, क्या कंपनी की जिम्मेदारी समाप्त कर देता है?

कंपनी की नियुक्ति और कैश कलेक्शन सिस्टम भी जांच के घेरे में
शिकायतकर्ता ने पुलिस से मांग की है कि मामले में केवल लखन गुर्जर की भूमिका की जांच न की जाए, बल्कि यह भी पता लगाया जाए कि—
- लखन गुर्जर की बजाज फाइनेंस में नियुक्ति और अधिकृत जिम्मेदारी क्या थी?
- क्या उसे ग्राहकों से नकद किस्त लेने की अनुमति थी?
- ₹16,350 लेने के संबंध में कंपनी के रिकॉर्ड में कोई एंट्री क्यों नहीं हुई?
- ग्राहक को रसीद जारी करने की व्यवस्था क्या थी?
- कर्मचारी के काम छोड़ने के बाद कंपनी ने उसके द्वारा की गई वसूली की जांच या ऑडिट किया या नहीं?
- राशि जमा नहीं होने की स्थिति में ग्राहक पर पेनल्टी और ब्याज क्यों लगाया गया?
- संबंधित शाखा के जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले की शिकायत मिलने के बाद क्या कार्रवाई की?
पत्रकार ने पुलिस से मांगी सख्त कार्रवाई
कीर्ति वर्रा ने थाना प्रभारी से मांग की है कि लखन गुर्जर के साथ-साथ बजाज फाइनेंस की संबंधित शाखा और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जाए। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करने के साथ ही शिकायतकर्ता की ₹16,350 की राशि वापस दिलाने तथा कथित रूप से लगी पेनल्टी एवं ब्याज हटाने के लिए आवश्यक कार्रवाई की मांग की गई है।
फिलहाल मामला पुलिस शिकायत तक पहुंच चुका है। अब देखना यह है कि जांच में ₹16,350 की राशि आखिर कहां गई, कर्मचारी ने किस हैसियत से नकद राशि ली और कंपनी के रिकॉर्ड में उसका हिसाब क्यों नहीं मिला।
सवाल सिर्फ ₹16,350 का नहीं, बल्कि ग्राहकों से ऋण की किस्त वसूलने वाली व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है। पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि इस पूरे मामले में वास्तविक जिम्मेदारी किसकी बनती है।
