रतलाम के जावरा में 25 सितंबर 2026 को प्रस्तावित सामूहिक गणेश विसर्जन जुलूस को लेकर पैलेस रोड़ मच्छी भवन के मैदान के उपयोग का मुद्दा गरमा गया है। ताज़ाया कमेटी, सीरत कमेटी जिसके सचिव नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़ में जेल में बंद था हाल ही में जमानत पर बाहर आया, और ये एक फर्म सोसायटी है जिसका ऑडिट सालो से अप्राप्त है। वही सुन्नी सीरत कमेटी है जो 4-4-2013 में ही निरस्त हो चुकी है। ऐसे कुछ मुस्लिम समाज के विभिन्न संगठनों ने अनुविभागीय अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर मच्छी भवन के मैदान से जुलूस प्रारंभ करने और वहीं समापन किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई है।

ज्ञापन में संगठनों का कहना है कि पैलेस रोड़ व मच्छी भवन मैदान का उपयोग मुस्लिम समाज पिछले लगभग 150 वर्षों से मुहर्रम, ईद मिलादुन्नबी सहित धार्मिक आयोजनों के लिए करता आया है। उनका दावा है कि मैदान में अब तक शांतिपूर्ण तरीके से धार्मिक आयोजन होते रहे हैं और किसी अन्य धर्म के कार्यक्रम के लिए मैदान के उपयोग की परंपरा नहीं रही है।
पहली बार दूसरे धार्मिक जुलूस पर आपत्ति, प्रशासन के सामने सवाल
मुस्लिम समाज के अनुसार उन्हें जानकारी मिली है कि 25 सितंबर को शाम 6 बजे से सामूहिक गणेश विसर्जन जुलूस मैदान से प्रारंभ होगा और जुलूस का समापन भी वहीं प्रस्तावित है। संगठनों ने इसे लेकर धार्मिक भावनाओं और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। फिर गंगा जमना तहजीब का ढिंढोरा क्यो पिटा जा रहा है। पैलेस रोड का मैदान कोई घर नही ले जा रहा है। केवल जुलूस शुरू होगा व समापन होगा। फिर इतनी कट्टरता ठीक नही। जबकि वह शासकीय है।
ज्ञापन में कहा गया है कि मैदान से पहली बार किसी अन्य धार्मिक आयोजन का जुलूस निकाले जाने से भविष्य में मैदान के उपयोग को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है। संगठनों ने प्रशासन से जुलूस के लिए वैकल्पिक स्थान निर्धारित करने की मांग की है। मतलब इन्होंने अनाधिकृत कब्जा कर लिया है मैदान तो सम्भवत शासकीय है।
150 साल के उपयोग का दावा, लेकिन दस्तावेज कहां?
इस पूरे विवाद के बीच अब एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि किसी स्थान के लंबे समय से धार्मिक उपयोग का दावा क्या केवल मौखिक परंपरा के आधार पर तय होगा या उसके समर्थन में प्रशासनिक एवं राजस्व रिकॉर्ड भी सामने रखे जाएंगे?
इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जैसे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित का कोई वैद्य दस्तावेज नही है वैसे ही जावरा में गंगा जमना तहजीब का भी कोई प्रमाणित दस्तावेज नही है। ये कट्टरवाद नही है तो क्या है।
यह टिप्पणी अब जावरा में चल रही बहस को और तीखा करने वाली है। एक ओर मुस्लिम समाज कर्बला मैदान के पारंपरिक धार्मिक उपयोग का हवाला देते हुए वैकल्पिक स्थान की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सवाल यह उठ रहा है कि प्रशासन किसी भी परंपरा, दावे या सार्वजनिक स्थल के उपयोग का निर्धारण किन दस्तावेजों और नियमों के आधार पर करेगा।
प्रशासन के निर्णय पर टिकी निगाहें
मुस्लिम समाज के संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी धार्मिक आयोजन के विरोधी नहीं हैं और उनका उद्देश्य किसी कार्यक्रम में बाधा डालना नहीं है। उनका कहना है कि धार्मिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए जुलूस के लिए वैकल्पिक स्थान तय किया जाना चाहिए।
अब पूरा मामला प्रशासन के निर्णय पर टिका है। क्या पैलेस रोड़ मच्छी भवन मैदान से प्रस्तावित गणेश विसर्जन जुलूस को अनुमति मिलेगी? क्या प्रशासन मैदान के पारंपरिक उपयोग के दावे की दस्तावेजों के आधार पर जांच करेगा? और क्या भविष्य के विवाद को रोकने के लिए कोई स्पष्ट नीति तय की जाएगी?
25 सितंबर से पहले प्रशासन के सामने इन सवालों का जवाब देना जरूरी होगा, क्योंकि मामला केवल एक जुलूस तक सीमित नहीं है—बल्कि धार्मिक आयोजन, सार्वजनिक स्थल के उपयोग, परंपरा और कानून-व्यवस्था, इन सभी से जुड़ चुका है।