November 5, 2026 11:43 am

RTI में स्वास्थ्य मंत्रालय का लिखित जवाब, टीकाकरण की अनिवार्यता और अभिभावकों की सहमति पर बड़ा सवाल

जेडी बैरागी वैष्णव, नई दिल्ली —-क्या सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल होने का मतलब यह है कि माता-पिता अपने बच्चे को टीका लगवाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं? क्या स्वास्थ्यकर्मी अभिभावक की सहमति के बिना बच्चे को टीका लगा सकते हैं? और यदि टीकाकरण को लेकर किसी परिवार के मन में सवाल हैं, तो क्या उसे उन सवालों के जवाब पाने का अधिकार है?

इन महत्वपूर्ण सवालों पर भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक लिखित RTI जवाब ने बहस को नई दिशा दी है। सामने आए दस्तावेज में मंत्रालय ने सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunization Programme—UIP) के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और बच्चों के टीकाकरण की कानूनी स्थिति तथा अभिभावकों की सहमति से जुड़े सवालों का जवाब दिया है।

29 सितंबर 2026 को जारी बताए गए इस पत्र में टीकाकरण को सामान्य परिस्थितियों में कानूनी रूप से अनिवार्य न होने और अभिभावक की सहमति के बिना टीका लगाने के सामान्य वैधानिक अधिकार के अभाव का उल्लेख है।

यह जवाब ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब टीकाकरण को लेकर नागरिकों को स्पष्ट जानकारी, स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी और सरकारी कार्यक्रमों की कानूनी सीमाओं को समझने की आवश्यकता है।

क्या कहता है मंत्रालय का लिखित जवाब?

सामने आए पत्र पर भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, प्रतिरक्षण अनुभाग का उल्लेख है। पत्र में RTI आवेदन संख्या MOHFW/R/T/26/01750 और MOHFW/R/T/26/01805 का संदर्भ दिया गया है।

पत्र के दूसरे बिंदु में मंत्रालय ने सवालों के जवाब बिंदुवार दर्ज किए हैं।

बिंदु 01, 03, 04 और 07: टीकाकरण को स्वैच्छिक बताया

पत्र में दर्ज जवाब के अनुसार, भारत सरकार के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और बच्चों को दिए जाने वाले टीकों का टीकाकरण कानूनी रूप से स्वैच्छिक है।

इसमें सामान्य परिस्थितियों में माता-पिता या अभिभावक को टीकाकरण के लिए बाध्य करने वाला कोई केंद्रीय कानून, अधिनियम, नियम या राजपत्र अधिसूचना नहीं होने की बात कही गई है। मतलब बिना इनकी मर्जी के किसी भी नवजात शिशु बच्चें व महिला पुरूष को किसी भी तरह का टीकाकरण नही किया जा सकता है।

इसका सीधा महत्व यह है कि सरकारी कार्यक्रम के तहत टीकाकरण की अनुशंसा और कानून के तहत उसकी अनिवार्यता को एक ही बात नहीं माना जाना चाहिए।

हालांकि, इस जवाब को भारत के प्रत्येक राज्य, हर परिस्थिति और सभी प्रकार के टीकाकरण पर लागू होने वाला सार्वभौमिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। किसी विशेष परिस्थिति में लागू कानूनों और नियमों की अलग से जांच आवश्यक है।

 बिंदु 05 और 06: अभिभावकों की सहमति का मुद्दा

RTI के जवाब में कहा गया है कि किसी सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र, आशा, एएनएम, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अथवा अन्य सरकारी अधिकारी को गर्भवती महिला या बच्चे के माता-पिता अथवा अभिभावक की सहमति के बिना टीका लगाने का कोई सामान्य वैधानिक अधिकार प्रदान नहीं किया गया है।

यह जवाब स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

क्या टीका लगाने से पहले संबंधित व्यक्ति को पर्याप्त जानकारी दी जा रही है? क्या अभिभावकों की शंकाओं का समाधान किया जाता है? क्या टीकाकरण की प्रक्रिया में सहमति और चिकित्सकीय सावधानियों का उचित ध्यान रखा जाता है?

इन सवालों पर स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

बिंदु 08: राष्ट्रीय टीकाकरण अनुसूची कहां उपलब्ध है?

पत्र में बताया गया है कि गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए वर्तमान राष्ट्रीय टीकाकरण अनुसूची (National Immunization Schedule—NIS) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट और U-WIN पोर्टल पर उपलब्ध है।

इससे नागरिकों को टीकों के नाम, निर्धारित खुराक और समय-सारणी के बारे में आधिकारिक जानकारी प्राप्त करने का रास्ता मिलता है।

 अब स्वास्थ्य विभाग से पूछे जाने चाहिए सीधे सवाल

मंत्रालय का यह जवाब केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पर चर्चा का अवसर है।

यदि नियमित टीकाकरण कानूनी रूप से स्वैच्छिक है, तो क्या यह बात प्रत्येक टीकाकरण केंद्र पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाती है?
क्या टीका लगाने से पहले अभिभावक को टीके का नाम, उद्देश्य, लाभ और संभावित दुष्प्रभाव बताए जाते हैं?
यदि अभिभावक किसी टीके को लेकर सवाल पूछता है, तो क्या उसे उचित चिकित्सकीय परामर्श दिया जाता है?
क्या टीकाकरण से पहले सहमति दर्ज करने की कोई निर्धारित प्रक्रिया है? यदि है, तो उसके नियम क्या हैं?
क्या किसी स्वास्थ्यकर्मी द्वारा अभिभावक की असहमति के बावजूद टीका लगाए जाने की शिकायत की जांच के लिए स्पष्ट व्यवस्था है?
यदि टीकाकरण को लेकर गलत जानकारी या दबाव की शिकायत मिलती है, तो जिम्मेदार अधिकारी कौन होगा?
क्या स्वास्थ्य विभाग इस विषय पर अभिभावकों के अधिकारों और टीकाकरण की कानूनी स्थिति को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करेगा?

इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि नागरिकों और स्वास्थ्य विभाग के बीच विश्वास बना रहे और किसी भी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश कम हो।

 माता-पिता इन चार बातों का रखें ध्यान

पहली बात: बच्चे को टीका लगवाने से पहले टीके का नाम, उसकी जरूरत और अगली खुराक की तारीख पूछें।

दूसरी बात: यदि बच्चे को पहले किसी टीके से गंभीर एलर्जी या असामान्य प्रतिक्रिया हुई है, तो स्वास्थ्यकर्मी को जरूर बताएं और चिकित्सकीय सलाह लें।

तीसरी बात: टीकाकरण की कानूनी अनिवार्यता और टीके के वैज्ञानिक लाभ अलग विषय हैं। टीका कानूनी रूप से अनिवार्य न होने का अर्थ यह नहीं कि वह चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक है।

चौथी बात: टीकाकरण से संबंधित किसी विवाद या शिकायत में संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी से लिखित स्पष्टीकरण मांगें और लागू नियमों की जानकारी प्राप्त करें।

 पत्र में क्या-क्या दर्ज है?
पत्र संख्या: Z.33013/73/2026-IMM
विभाग: भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, प्रतिरक्षण अनुभाग
RTI आवेदन संख्या: MOHFW/R/T/26/01750, दिनांक 01 सितंबर 2026
अन्य संदर्भ: MOHFW/R/T/26/01805, दिनांक 07 सितंबर 2026
पत्र की तारीख: 29 सितंबर 2026
संबोधित व्यक्ति: श्री विनय सिंह, इंदौर, मध्य प्रदेश
हस्ताक्षरकर्ता के रूप में दर्ज नाम: राजेश कुमार, अवर सचिव एवं केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी

 निष्कर्ष: जनता को स्पष्ट जवाब मिले, भ्रम नहीं

स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। टीकाकरण जैसे संवेदनशील विषय पर नागरिकों को न तो अधूरी जानकारी के आधार पर डराया जाना चाहिए और न ही उनके सवालों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए।

भारत सरकार के इस RTI जवाब में दर्ज निष्कर्षों के आधार पर यह जरूरी है कि स्वास्थ्य विभाग टीकाकरण की कानूनी स्थिति, सहमति की प्रक्रिया और अभिभावकों को दी जाने वाली जानकारी के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जनता के सामने रखे।

साथ ही, इस पत्र को न्यायालय का फैसला या सभी परिस्थितियों पर लागू होने वाला अंतिम कानूनी निर्णय बताना सही नहीं होगा। किसी विशेष विवाद में संबंधित कानून और परिस्थितियां देखना जरूरी है।

जनता का सवाल सीधा है—यदि कोई प्रक्रिया स्वैच्छिक है, तो उसके नियम स्पष्ट रूप से क्यों न बताए जाएं? और यदि किसी नागरिक को संदेह है, तो उसे जानकारी देने के बजाय दबाव क्यों महसूस होना चाहिए?

स्वास्थ्य विभाग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। जागरूक नागरिक, पारदर्शी व्यवस्था और वैज्ञानिक जानकारी—तीनों मिलकर ही जनस्वास्थ्य को मजबूत बना सकते हैं।

कोरोना वैक्सीन को लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पल्ला झाड़ा

 कोविड19 में कोरोना वैक्सीन को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोविड-19 का टीका लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उसके बाद क्या हुआ देश जानता है। किसी को राशन नही मिला, बिना सर्टिफिकेट के यात्री, दरशनार्थी जैसे अनेक आमलोगों पर प्रतिबंध लगाए गए।

इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण तारीख 13 जनवरी 2022 है, जब केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा (affidavit) दाखिल किया था। इसकी खबर 16–17 जनवरी 2022 को प्रकाशित हुई थी।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा था?

1. टीका लगवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सरकार ने कहा कि कोविड टीकाकरण संबंधी उसके दिशानिर्देश किसी व्यक्ति की सहमति के बिना जबरन टीकाकरण की परिकल्पना नहीं करते।

2. कोविड वैक्सीन लगवाने की सलाह दी गई थी। सरकार ने साथ ही कहा था कि महामारी के दौरान टीकाकरण व्यापक जनहित में है और नागरिकों को टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

3. वैक्सीन प्रमाणपत्र पर भी बयान दिया था। केंद्र ने कहा था कि उसने ऐसा कोई मानक संचालन निर्देश (SOP) जारी नहीं किया, जिसके तहत किसी भी उद्देश्य के लिए कोविड वैक्सीन प्रमाणपत्र साथ रखना अनिवार्य हो।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

2 मई 2022 — जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया कि केंद्र सरकार के अनुसार कोविड टीकाकरण स्वैच्छिक था और टीकाकरण को लाभों या सेवाओं से नहीं जोड़ा गया था। फैसले में न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को टीका लगवाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए; हालांकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है, बशर्ते वे कानून की कसौटी पर खरे उतरें।

RTI की कॉपी

सरकार का हलफनामा 13 जनवरी 2022 को दाखिल हुआ था, जबकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला 2 मई 2022 को आया। दोनों को एक ही तारीख या एक ही दस्तावेज बताना सही नहीं होगा।

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