रतलाम जिले के जावरा में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर प्रशासन की कार्रवाई ने बाजार में हड़कंप मचा दिया है। शक्ति भोग घी और अमृत प्योर घी के नमूने खाद्य प्रयोगशाला की जांच में मानकों पर खरे नहीं उतरने के बाद प्रशासन ने संबंधित फर्म के खिलाफ कार्रवाई की है। मामले में पांच प्रतिष्ठानों/प्रतिवादियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना, यानी कुल 5 लाख रुपये का अर्थदंड लगाया गया है।
जानकारी के अनुसार दोनों घी के नमूने जावरा की मनीष सेल्स से लिए गए थे। खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा लिए गए नमूनों को जांच के लिए खाद्य प्रयोगशाला भेजा गया। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद दोनों घी के नमूनों को निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।
नमूने फेल होते ही प्रशासन की कार्रवाई
खाद्य पदार्थों में मिलावट और गुणवत्ता से समझौते के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि आखिर बाजार में बिकने वाले खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है।
मामले में अपर जिला दण्डाधिकारी बुजेन्द्र रावत द्वारा खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ज्योति बघेल द्वारा लिए गए नमूनों और जांच रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई की गई।
एक नहीं, कुल 5 लाख का जुर्माना
प्रशासनिक कार्रवाई में पांच प्रतिवादियों पर 1-1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इस तरह कुल जुर्माने की राशि 5 लाख रुपये बताई गई है।
कार्रवाई के साथ संबंधित खाद्य प्रतिष्ठानों को भविष्य में खाद्य सुरक्षा मानकों का पूर्ण पालन करने की चेतावनी भी दी गई है। मौके पर जब्त खाद्य सामग्री का नियमानुसार विनिष्टीकरण किए जाने की बात भी सामने आई है।
जुर्माना नहीं भरा तो भू-राजस्व बकाया के रूप में होगी वसूली
मामला सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं है। जारी जानकारी के अनुसार जुर्माना आदेश मिलने के बाद निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं करने पर उसे भू-राजस्व बकाया के रूप में वसूल किए जाने की कार्रवाई की जा सकती है।
साथ ही जुर्माना जमा होने तक संबंधित खाद्य प्रतिष्ठान की अनुमति निलंबित रहने की बात भी सामने आई है।
अब सवाल बाजार में बिक रहे खाद्य पदार्थों की जांच कितनी नियमित?
घी जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ सीधे लोगों की रसोई तक पहुंचते हैं। ऐसे में किसी उत्पाद का नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरना उपभोक्ताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
यह कार्रवाई केवल पांच लाख रुपये के जुर्माने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इससे बाजार में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांच को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या बाजार में बिक रहे अन्य ब्रांडों और खाद्य पदार्थों के भी नियमित नमूने लिए जा रहे हैं? क्या हर स्तर पर निगरानी हो रही है?
प्रशासन की कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि खाद्य सुरक्षा मानकों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आगे भी खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा इसी तरह लगातार नमूने लेकर जांच और कार्रवाई की जाती है या नहीं।
खाद्य सुरक्षा सीधे जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है—इसलिए जांच में फेल होने वाले खाद्य उत्पादों पर कार्रवाई और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण हैं।