जेडी बैरागी वैष्णव, शुभदर्शन TV न्यूज़ चैनल—रतलाम जिले में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अब खुलकर सवाल उठने लगे हैं। जनता से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही चर्चा जोरों पर है—क्या जिले के कलेक्टर और एसपी अब संवेदनशील नहीं रहे? क्या प्रशासन पूरी तरह दबाव में काम कर रहा है?
एक समय था जब जिले की कमान संभाल रहे अधिकारियों के नाम ही जनता के भरोसे की पहचान थे। सिर्फ एक व्हाट्सएप संदेश पर कार्रवाई हो जाती थी, अवैध गतिविधियों पर तत्काल शिकंजा कसता था और कानून व्यवस्था मजबूत नजर आती थी। लेकिन वर्तमान हालात में वही सिस्टम सुस्त, लाचार और सवालों के घेरे में दिखाई दे रहा है।
“आवेदन से लेकर कार्रवाई तक—सब कुछ अटका”
आज स्थिति यह है कि आम नागरिक शिकायत लेकर भटकता रह जाता है। आवेदन, निवेदन, जांच—इन सबके बीच कार्रवाई कहीं खो जाती है। आरोप लग रहे हैं कि अब फैसले नियमों से नहीं बल्कि “सेटिंग” और “दबाव” से तय हो रहे हैं।
पुलिस पर भी सवाल, FIR पर उठी उंगली
जिले की पुलिस व्यवस्था पर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि बिना पूरी सच्चाई जाने दबाव में एफआईआर दर्ज की जा रही है। चाहे वह किसी एनजीओ का दबाव हो या किसी विशेष वर्ग का—तथ्यों की जांच से पहले कार्रवाई होने से पुलिस की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं।
राजस्व विभाग में तनाव—पटवारी की मौत ने खोली पोल
राजस्व विभाग की हालत तो और भी चिंताजनक बताई जा रही है। एक पटवारी द्वारा आत्महत्या का मामला प्रशासनिक दबाव की ओर इशारा करता है। यह घटना न सिर्फ विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि अंदरूनी हालात कितने गंभीर हैं।
अवैध कारोबार और भ्रष्टाचार का बोलबाला?
जिले में अवैध शराब की बिक्री खुलेआम होने के आरोप हैं। सड़कों के नाम पर लीपापोती, पंचायत और नगर निकायों में प्रतिशत के खेल, और निर्माण कार्यों में भारी अनियमितताओं की चर्चाएं आम हो चुकी हैं। आरोप है कि लाखों के काम हजारों में दिखाकर बंदरबांट किया जा रहा है।
ड्रग फैक्ट्री केस पर भी उठे सवाल
हाल ही में चिकलाना क्षेत्र में करोड़ों की ड्रग फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। आरोपी के पास बड़ी संपत्तियों के दस्तावेज मिलने के बावजूद नगदी बरामद न होना लोगों को खटक रहा है। यह मामला भी प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़ा कर रहा है।
“राजनीति हावी, प्रशासन दबाव में”
सूत्रों के अनुसार, जिले में प्रशासनिक निर्णयों पर राजनीतिक दबाव हावी है। यही कारण है कि कार्रवाई में निष्पक्षता कम और प्रभाव ज्यादा नजर आता है। एक समाजसेवी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पहले छोटे कार्यकर्ता तक काम करवा लेते थे, लेकिन अब जनप्रतिनिधि भी असहाय नजर आ रहे हैं।
“ऊपर से नीचे तक सिस्टम पर असर”
जब जिले के शीर्ष अधिकारी ही सवालों में हों, तो नीचे के विभागों में ढिलाई और मनमानी बढ़ना स्वाभाविक है। यही वजह है कि आज हर विभाग में अव्यवस्था और असंतोष साफ दिखाई दे रहा है।
जनता पूछ रही—जिम्मेदार कौन?
रतलाम की जनता अब सीधे सवाल कर रही है—क्या प्रशासनिक संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है? क्या नियम कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस पूरे सिस्टम की जड़ कहीं न कहीं राजनीतिक हस्तक्षेप है? या प्रदेश की कमान ही गलत हाथों में है, जिसके कारण प्रदेश व जिले के हालत ऐसे है, क्योंकि एक कहावत है की, सन्या भये कोतवाली तो काहे का डर। रतलाम में उठ रहे ये सवाल सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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