November 5, 2026 11:58 am

RTI के खुलासे से सुन्नी सीरत कमेटी पर बड़े सवाल! 2013 में निरस्त संस्था के नाम पर चंदा वसूली का आरोप, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल जावरा में संस्था की वैधता से लेकर लाखों के चंदे तक घमासान—मुस्लिम समाज पूछ रहा है, आखिर कार्रवाई कब?

जेडी बैरागी वैष्णव—रतलाम जिले के जावरा में इन दिनों सुन्नी सीरत कमेटी की वैधता, उसके कथित संचालन, चंदा वसूली और आर्थिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक RTI कार्यकर्ता द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार संबंधित संस्था का पंजीयन 4 अप्रैल 2013 को निरस्त हो चुका था। इसके बावजूद संस्था के नाम से गतिविधियां और कथित चंदा संग्रह जारी रहने के आरोप सामने आए हैं।
RTI से प्राप्त दस्तावेजों को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि संस्था वास्तव में 2013 में निरस्त हो चुकी थी, तो उसके बाद उसके नाम पर गतिविधियां किस कानूनी आधार पर संचालित की गईं?
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि संस्था से जुड़े लोगों की भूमिका और कथित आर्थिक लेन-देन को लेकर समाज के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि संस्था वैध है तो उसके पंजीयन दस्तावेज सामने रखे जाएं और यदि संस्था निरस्त है तो उसके नाम पर की गई गतिविधियों एवं कथित चंदा वसूली की जांच की जाए।
कमेटी सचिव अमजद खान के अनुसार 1968 से  कार्यरत है, लेकिन 2013 में संस्था , फिर अचानक निरस्तीकरण लेकिन सवाल 2026 तक कायम
उपलब्ध RTI जानकारी के अनुसार संस्था का अस्तित्व वर्ष 1968 से 2013 तक बताया गया है और 4 अप्रैल 2013 को उसका पंजीयन निरस्त हुआ।
अब सवाल केवल पुराने पंजीयन का नहीं है। असली सवाल यह है कि निरस्तीकरण के बाद संस्था के नाम का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
यदि हुआ तो—
किसने संस्था का नाम इस्तेमाल किया?
किस अधिकार से कार्यक्रम आयोजित किए गए?
चंदे की रसीदें किस नाम से काटी गईं?
प्राप्त राशि किसके पास जमा हुई?
बैंक खाता किस नाम से संचालित हुआ?
आय-व्यय का हिसाब किसने रखा?
क्या कोई ऑडिट कराया गया?
समाज के सामने वित्तीय विवरण क्यों नहीं रखा गया?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए, मौखिक दावों से नहीं।
चंदे का हिसाब कहां है?
समाज में यह चर्चा भी सामने आई है कि संस्था के नाम पर लंबे समय से चंदा एकत्र किया जाता रहा। यहां तक कि पिछले समय में लगभग 10 लाख रुपये की बचत होने की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने आने का दावा किया जा रहा है।
यदि यह राशि वास्तव में संस्था के नाम से एकत्र हुई है, तो उसका पूरा हिसाब सामने आना चाहिए।
रसीद बुक कहां है?
बैंक स्टेटमेंट कहां है?
ऑडिट रिपोर्ट कहां है?
आय-व्यय विवरण कहां है?
राशि वर्तमान में किसके नियंत्रण में है?
ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सार्वजनिक पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही के सवाल हैं।
“बैंक खाता नहीं है” – तो फिर आर्थिक लेन-देन का रिकॉर्ड क्या है?
मामले में संस्था के सचिव अमजद खान की ओर से कथित रूप से संस्था का बैंक खाता नहीं होने की बात सामने आने का दावा किया गया है।
यदि संस्था के नाम पर कोई आर्थिक गतिविधि नहीं हुई, तो चंदे और बचत से जुड़ी चर्चाओं का आधार क्या है?
और यदि आर्थिक गतिविधियां हुईं, तो उनका रिकॉर्ड कहां है?
प्रशासन को इस पूरे मामले में पंजीयन दस्तावेज, रसीद बुक, बैंक रिकॉर्ड, ऑडिट रिपोर्ट और आय-व्यय विवरण की जांच करनी चाहिए। अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
उधर सीरत कमेटी अध्यक्ष के इस्तीफे और सचिव पर दर्ज प्रकरण के बाद बढ़ा विवाद
मामले को लेकर चर्चा उस समय और तेज हुई जब कमेटी अध्यक्ष साबिर सेठ के इस्तीफे की बात सोशल मीडिया पर सामने आई। इसी दौरान कमेटी के सचिव अबरार खान पर संबंधित एक मामले में स्कूल छात्रा से छेड़छाड़ और पॉक्सो एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई। ऐसी बात पर किसी लेखक ने कहा है।

राजनीति हो या शतरंज केवल मोहरे मारे जाते है।  राजा कभी नही मरता वो केवल खेल प्यादों व मोहरों के दम पर खेल खेलते रहते है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी आपराधिक मामले में आरोप लगना और न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। संबंधित व्यक्ति को अपना कानूनी पक्ष रखने का पूरा अधिकार है।
लेकिन इन घटनाओं के बाद संस्था की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
समाज को सब पता नहीं होना चाहिए?”—कथित बयान ने बढ़ाई नाराजगी, सुन्नी सीरत कमेटी अध्यक्ष सचिव- मामले में संस्था से जुड़े लोगों द्वारा समाज के संबंध में कथित रूप से आपत्तिजनक बातें कहे जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यदि वास्तव में ऐसा कोई बयान दिया गया है कि समाज को संस्था की स्थिति से कोई लेना-देना नहीं और निर्णय कुछ लोग ही करेंगे, तो यह बेहद गंभीर सामाजिक प्रश्न है।
आखिर संस्था किसके लिए है?
समाज के लिए या कुछ व्यक्तियों के लिए?
यदि चंदा समाज से लिया जाता है, कार्यक्रम समाज के नाम पर होते हैं और संस्था का नाम समाज के सामने इस्तेमाल होता है, तो समाज को हिसाब मांगने का पूरा अधिकार है।

“तैमूरलंग” नाम से चर्चित व्यक्ति को लेकर भी सवाल
जावरा में फर्म सोसायटियो को गुमराह करने वाला एक व्यक्ति को कथित तौर पर “तैमूरलंग” के नाम से संबोधित किए जाने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। आरोप है कि संबंधित व्यक्ति अपनी कथित पहुंच और प्रभाव का हवाला देकर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव बनाने का प्रयास करता रहा है।
“दिल्ली तक पहुंच” और 20 हजार रुपये मांगने का आरोप
मामले में एक राजनीतिक व्यक्ति द्वारा कथित तौर पर यह आरोप लगाए जाने की चर्चा है कि संबंधित व्यक्ति ने दिल्ली तक अपनी पहुंच होने और प्रभावशाली लोगों से काम करवाने का दावा किया तथा इसके लिए कथित तौर पर 20 हजार रुपये की मांग की।
यदि ऐसा दावा किया गया था तो जांच एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि—

मस्जिद के कूलर का मामला भी चर्चा में
एक समाजसेवी द्वारा कथित रूप से आरोप लगाया गया है कि मस्जिद के लिए उपलब्ध करवाए गए कूलर बाद में संबंधित व्यक्ति के घर पर लगाए गए।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह केवल एक कूलर का मामला नहीं, बल्कि दान और सामाजिक विश्वास के दुरुपयोग का प्रश्न बन सकता है।

वक्फ संपत्ति पर भी उठे गंभीर सवाल
मामले में वक्फ संपत्ति से जुड़े आरोप भी सामने आए हैं। दावा किया जा रहा है कि किसी संस्था या फर्म के माध्यम से संबंधित वक़्फ़ संपत्ति पर गतिविधियां संचालित करने का प्रयास किया गया।
यदि ऐसा है तो इसकी जांच केवल बयानबाजी से नहीं बल्कि
वक्फ रिकॉर्ड, राजस्व रिकॉर्ड, पंजीयन दस्तावेज, मौके की स्थिति और संबंधित अनुमति पत्रों के आधार पर होनी चाहिए। यह काम प्रशासन का है लेकिन प्रशासन आंखे बंद कर सब देख रहा है।  यदि किसी संपत्ति पर अनाधिकृत कब्जा या उपयोग पाया जाता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं किसी अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति पर मिलीभगत का आरोप तभी सही माना जा सकता है जब जांच में उसका ठोस प्रमाण सामने आए।
प्रशासन की चुप्पी पर सबसे बड़ा सवाल
अब पूरे मामले में सबसे ज्यादा निगाह प्रशासन पर है।
यदि RTI में संस्था के निरस्तीकरण से संबंधित दस्तावेज सामने आए हैं तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्या संस्था वास्तव में निरस्त है?
यदि हां, तो उसके नाम पर गतिविधियां क्यों चल रही हैं?
चंदा वसूली की शिकायतों की जांच होगी या नहीं?
आय-व्यय का ऑडिट कराया जाएगा या नहीं?
वक्फ संपत्ति की जांच होगी या नहीं?
पदाधिकारियों से दस्तावेज मांगे जाएंगे या नहीं?
यदि अनियमितता मिली तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या नहीं?
इन सवालों के जवाब अब जावरा का समाज प्रशासन से मांग रहा है।
सवाल व्यक्ति का नहीं पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता का है
यह पूरा विवाद किसी एक व्यक्ति या एक गुट तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यदि संस्था वैध है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।
यदि संस्था निरस्त है तो उसके नाम पर संचालित गतिविधियों की जांच हो और बिना देरी के कार्रवाई की जाए।
यदि चंदा लिया गया है तो उसका हिसाब सामने आए।
यदि कोई आरोप गलत है तो संबंधित लोग प्रमाणों के साथ अपना पक्ष रखें।
कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
मुस्लिम समाज की मांगजांच हो, सच सामने आए
जावरा के जागरूक नागरिकों और मुस्लिम समाज के लोगों के बीच अब यह मांग उठ रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच कराई जाए।
समाज किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करना चाहता, लेकिन समाज यह जरूर जानना चाहता है कि उसके नाम पर चलने वाली संस्थाओं का वास्तविक कानूनी दर्जा क्या है और उसके नाम पर एकत्र होने वाले धन का हिसाब कहां है।
धर्म और समाज के नाम पर विश्वास मिलता है, लेकिन उस विश्वास के साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
प्रशासन के सामने अब सीधी चुनौती
अब गेंद प्रशासन के पाले में है। यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी करे।
यदि दस्तावेजों में अनियमितता है तो जिम्मेदारों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो। और यदि संस्था वास्तव में वैध है तो उसके वैध दस्तावेज सामने रखकर समाज में उठ रहे सवालों को समाप्त किया जाए। क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि “कमेटी कौन चला रहा है?”
सबसे बड़ा सवाल है—
“अगर संस्था निरस्त थी तो इतने वर्षों तक उसके नाम पर क्या चलता रहा और किसके संरक्षण में चलता रहा?”
और दूसरा सवाल—
“समाज से लिया गया पैसा आखिर गया कहां?”
जावरा का समाज अब जवाब चाहता है।
आरोपों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं, लेकिन आरोपों की जांच न करना उससे भी बड़ा सवाल है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच करता है या फाइलों के नीचे दबे सवाल फिर खामोश हो जाते हैं।
पूछता है मुस्लिम समाज—
दस्तावेज सामने आएंगे या फिर चुप्पी ही जवाब होगी?

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