नई दिल्ली- लोन की किश्तें बकाया होने का मतलब यह कतई नहीं है कि बैंक या फाइनेंस कंपनी अपने रिकवरी एजेंटों के जरिए किसी व्यक्ति के वाहन को जबरन, चोरी-छिपे या आधी रात में उठवा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि वित्तीय संस्थानों को अपना बकाया वसूलने का अधिकार है, लेकिन वसूली का तरीका कानून, अनुबंध और RBI के निर्धारित सुरक्षा मानकों के दायरे में ही होना चाहिए।
16 सितंबर 2026 को ने Hari Dutta Sharma बनाम State of U.P. & Others मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए वाहन जब्ती की कार्रवाई को गैरकानूनी और मनमाना माना। फैसला जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनाया।
मामला था आजीविका से जुड़े Tata SFC 407 ट्रक का
मामला उत्तर प्रदेश के हरि दत्ता शर्मा से जुड़ा है। उन्होंने 25 मार्च 2019 को से Tata SFC 407 ट्रक के लिए कमर्शियल व्हीकल लोन लिया था।
लोन की स्वीकृत राशि करीब ₹10.40 लाख थी, जिसमें ₹9.36 लाख जारी किए गए थे। इसे 75 मासिक किस्तों में चुकाना था। बाद में जून 2021 में अतिरिक्त लोन भी दिया गया। किस्तों में लगातार चूक के बाद कंपनी और वाहन मालिक के बीच विवाद बढ़ता गया।
कंपनी का कहना था कि उसने बकाया भुगतान के लिए नोटिस जारी किए थे। दूसरी ओर, हरि दत्ता शर्मा का आरोप था कि 9 अप्रैल 2023 की रात करीब 1 बजे चार अज्ञात लोग उनके ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले गए।
उन्होंने उसी दिन वाहन चोरी होने की रिपोर्ट और ई-एफआईआर दर्ज कराई। बाद में 30 सितंबर 2023 को कंपनी के कानूनी नोटिस से उन्हें पता चला कि वाहन कंपनी ने अपने कब्जे में लेकर 31 अगस्त 2023 को ₹4.50 लाख में बेच दिया था।
हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली, सुप्रीम कोर्ट में बदला पूरा मामला
हरि दत्ता शर्मा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 4 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने पूरे मामले के दस्तावेज और RBI के दिशानिर्देशों की समीक्षा की और पाया कि वाहन की जब्ती के तरीके को केवल इसलिए सही नहीं ठहराया जा सकता कि उधारकर्ता ने लोन की किश्तों में डिफॉल्ट किया था।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक—रिकवरी का अधिकार है, लेकिन कानून हाथ में लेने का नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्तीय संस्थान को अनुबंध के अनुसार वाहन का कब्जा लेने का अधिकार हो सकता है, लेकिन यह अधिकार बल प्रयोग, चोरी-छिपे कार्रवाई या आधी रात में जबरन कब्जा करने का खुला लाइसेंस नहीं है।
अदालत ने कहा कि यदि ऐसे अधिकार पर नियंत्रण न हो तो यह वाहन को बलपूर्वक या चोरी-छिपे कब्जे में लेने की अनुमति जैसा बन सकता है।
RBI के नियमों को कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने RBI की Fair Practices Code से जुड़े दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि रिकवरी के दौरान उधारकर्ताओं को अनुचित तरीके से परेशान नहीं किया जा सकता। बेवक्त परेशान करना और मसल पावर का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है।
अदालत ने यह भी कहा कि वाहन की जब्ती कानूनी तरीके से ही हो सकती है, और बैंक या वित्तीय संस्थान जबरन कब्जा लेने के लिए गुंडों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
RBI के ढांचे में repossession clause के अंदर नोटिस अवधि, कब्जा लेने की प्रक्रिया, बिक्री से पहले अंतिम अवसर और वाहन की बिक्री/नीलामी की प्रक्रिया जैसे पहलुओं का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए।
7 दिन की नोटिस क्यों बनी फैसले का अहम हिस्सा?
इस मामले के Loan Agreement के Article 11 में साफ तौर पर डिफॉल्ट के बाद 7 दिन की पूर्व सूचना का प्रावधान था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ऐसी सात दिन की नोटिस वास्तव में वाहन कब्जे में लेने से पहले नहीं दी गई थी। अदालत ने माना कि जब अनुबंध में repossession को नोटिस से जोड़ा गया है और वह शर्त पूरी नहीं हुई, तो कंपनी को उस तरीके से कब्जा लेने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।
यानी इस फैसले को यह कहकर समझना अधिक सही होगा कि हर वाहन जब्ती में सार्वभौमिक रूप से सिर्फ “7 दिन” का नियम घोषित नहीं किया गया, बल्कि इस मामले में सात दिन की पूर्व सूचना स्वयं Loan Agreement का हिस्सा थी और उसका पालन नहीं किया गया।
आधी रात 1 बजे लॉक तोड़कर वाहन उठाने पर कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर उस घटना को गंभीर माना जिसमें 9 अप्रैल 2023 को लगभग 1 बजे रात वाहन का स्टीयरिंग लॉक तोड़कर कब्जा लिया गया।
अदालत ने इसे शांतिपूर्ण कब्जा लेने की कार्रवाई नहीं माना और कहा कि इस तरह की कार्रवाई उस “goonda-ism” के ठीक विपरीत है जिसकी निंदा सुप्रीम कोर्ट और RBI पहले भी कर चुके हैं।
अदालत ने यह भी नोट किया कि possession memorandum पर वाहन मालिक के हस्ताक्षर नहीं थे।
फाइनेंस कंपनी पर लाखों का आर्थिक बोझ
सुप्रीम कोर्ट ने वाहन की बिक्री को इस स्तर पर रद्द नहीं किया क्योंकि वाहन पहले ही 31 अगस्त 2023 को बेचा जा चुका था। लेकिन कंपनी को कई महत्वपूर्ण आर्थिक निर्देश दिए गए।
अदालत के आदेश:
1️⃣ दोनों Loan Accounts बंद करने होंगे।
2️⃣ ₹4,50,000 वापस करने होंगे।
यही वह रकम थी जिस पर वाहन बेचा गया था। इस राशि पर बिक्री की तारीख से भुगतान होने तक 6% सालाना ब्याज भी देना होगा।
3️⃣ ₹10,00,000 मुआवजा देना होगा।
अदालत ने इसे मानसिक पीड़ा और लंबे समय तक आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजे के रूप में दिया।
4️⃣ ₹50,000 मुकदमे का खर्च भी कंपनी को देना होगा।
यानी केवल ₹10 लाख मुआवजे तक मामला सीमित नहीं रहा—₹4.50 लाख की बिक्री राशि 6% ब्याज सहित लौटाने और ₹50 हजार लागत देने का भी निर्देश दिया गया।
RBI को भी सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल हरि दत्ता शर्मा को मिला मुआवजा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RBI द्वारा बैंकों और NBFCs के लिए जारी किए गए कई Guidelines, Master Circulars और Clarifications व्यवहार में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं।
अदालत ने RBI को निर्देश दिया कि वह इन नियमों का वास्तविक और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए, ताकि भविष्य में किसी नागरिक को बिना उचित नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के रात के अंधेरे में उसकी आजीविका के साधन से वंचित न किया जाए। फैसले की प्रति RBI को भेजने का भी निर्देश दिया गया।
वाहन मालिकों के लिए क्या है बड़ा संदेश?
अगर किसी व्यक्ति ने बैंक या NBFC से वाहन लोन लिया है और किस्तें बकाया हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वित्तीय संस्था मनमाने तरीके से वाहन उठा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस ढांचे पर जोर दिया है, उसमें मुख्य बातें हैं—
🔴 रिकवरी में अनुचित उत्पीड़न नहीं।
🔴 बेवक्त परेशान करने या मसल पावर का इस्तेमाल नहीं।
🔴 वाहन कब्जे में लेने की प्रक्रिया कानूनी होनी चाहिए।
🔴 Recovery agents को RBI के लागू नियमों का पालन करना होगा।
🔴 Repossession clause वैध और निष्पक्ष होना चाहिए।
🔴 नोटिस और कब्जे की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
🔴 बिक्री से पहले उधारकर्ता को उपलब्ध वैधानिक/अनुबंधीय अवसरों का पालन होना चाहिए।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि लोन की किश्तें जमा न करने पर बैंक या NBFC वाहन कभी जब्त नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना है कि वैध अनुबंध के तहत वित्तीय संस्था को वाहन का कब्जा लेने का अधिकार हो सकता है।
फैसले का केंद्रीय मुद्दा यह है कि वह अधिकार कानून और निर्धारित प्रक्रिया के भीतर इस्तेमाल किया जाए।
अब सवाल सिर्फ किश्तों का नहीं, रिकवरी के तरीके का भी है!
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि “डिफॉल्ट” वित्तीय संस्था को कानून से ऊपर नहीं कर देता।
लोन की वसूली की जा सकती है, वाहन की वैधानिक repossession भी संभव हो सकती है—लेकिन बल, धमकी, चोरी-छिपे कब्जा, अनुचित उत्पीड़न और अनुबंध/RBI safeguards की अनदेखी करके नहीं।
हरि दत्ता शर्मा के मामले में आधी रात वाहन कब्जे में लेने की कार्रवाई अंततः कंपनी के लिए भारी पड़ी—ट्रक वापस नहीं मिला, लेकिन कंपनी को ₹4.50 लाख ब्याज सहित लौटाने, ₹10 लाख मुआवजा देने, ₹50 हजार लागत देने और दोनों लोन खाते बंद करने का आदेश मिला।
कानून का संदेश साफ है—बकाया वसूली का अधिकार है, लेकिन कानून को ताक पर रखकर वसूली करने का अधिकार किसी को नहीं।